भारत में शौचालय की भयावह स्थिति – एक शर्मसार हकीकत !

 

देश में कितनी ही समस्या अभी मौजूद हो पर भारत में शौचालय की भयावह स्थिति ऐसी है जिसे नजरंदाज नही किया जा सकता ! बच्चे हो य बढ़े,पुरुष हो य स्त्री , सब भारत में शौचालय की भयावह स्थिति से परेशान है ! इस समस्या के अंत के लिए कई समाज-सेवियों ने खूब प्रयास किये , कुछ गैर-सरकारी संगठनो ने भी इसके लिए जागरूकता अभियान चलाये और तो और देश की वर्तमान सरकार ने भी इसे गम्भीरता से लिया ! पर इस जागरूकता

भारत में शौचालय की भयावह स्थिति - एक शर्मसार हकीकत !
शौचालय की बर्बाद स्थिति का दृश्य

अभियान को उतनी सफलता नही मिल पाई जितनी मिलनी चाहिए ! इस विकट समस्या का भी वही हाल हुआ जो स्वच्छता अभियान का हुआ था ! स्वच्छता अभियान की तरह इसका भी कुछ लोगो ने अपने लोकप्रियता,स्वार्थ के लिए तो नेताओ ने वोट के लिए इस्तेमाल किया ! टीवी,समाचार पत्रों में और अन्य समाचार संचार साधनों में शौचालय बनने के बड़े बड़े सुर्खियों वाले खबर तो बराबर आते रहते पर धरातल में स्थिति बहुत ही गम्भीर है ! कई जगह सार्वजनिक शौचालय तो है पर उनकी स्थिति इतनी बद से बदत्तर है कि कोई वहां शौच करने जाये तो उसे उलटी हो जाये,कुछ तो इतनी दुर्गम बदबू से खांसते खांसते बेदम भी हो जाते है तो कुछ का शौचालय देखकर नजारा ही मरीजो जैसा हो जाता है ! शौचालय होने के बावजूद कई लोग बाहर शौच करना पसंद करते है ! कुछ लोग नाक में रुमाल बांध कर शौचालय का प्रयोग करते है ! कारण है शौचालय का अस्वच्छ होना ! शौचालय में साफ़-सफाई की कोई खास व्यवस्था नही है और ऐसा नही है कि स्वच्छता विभाग ने इसकी सफाई के लिए सफाई कर्मी नियुक्त नही किये पर इतनी दरिंदगी और हैवानियत का विकराल रूप जो सार्वजनिक शौचालय का होता है उससे सफाई कर्मी भी डर से य लज्जा से इसे साफ करने से बचते है !

भारतीय रेलवे में भी लगभग यही हाल है ! यदि कोई यात्री शौचालय का प्रयोग करने जाता है तो अंदर का नजारा ऐसा होता है जैसे भूकम्प य तबाही हुयी हो ! मल त्याग करने का ऐसा तरीका सिर्फ भारतीय रेल में ही देखने को मिल सकता है और साथ साथ हाश्मी अंसारी,सूफी साईं और न जाने कितने मौलाना बाबा के दवाई के विज्ञापन,रूठे को मनाना,काला-जादू,टोन-टोटके आदि आदि के पोस्टर अंदर का नजारा भयावह बनाते है ! भारतीय रेल के डिब्बो में शौचालय में य तो कभी पानी नही आता य फिर बेहिसाब बिना रुके पानी आता है ! य फिर शौचालय इतना गंदा होता है कि उसका इस्तेमाल करना अपने स्वाभिमान को दांव पे लगाना जैसा होता है !

वही दूसरी तरफ निजी शौचालय सुविधाजनक होते है और उनकी बराबर साफ़-सफाई होती रहती है ! अब जिनके पास खुल्ले पैसे हो वो ही वहां शौच-आदि से निवृत हो सकता है ! मॉल य अन्य निशुल्क जगहों पर शौचालय का प्रयोग मुफ्त तो है पर वहां मनुष्य को अंदर जाने की स्वीकृति उसके वस्त्रो के पहनावे पर आधारित होती है अतः वहां के शौचालय का प्रयोग वही कर सकता है जो सुंदर वस्त्र का आवरण किये भारत में शौचालय की भयावह स्थिति - एक शर्मसार हकीकत !हुए हो ! कोई गरीब य भिकारी का वहां एक तरह से प्रवेश वर्जित ही है ! जो शुल्क देकर य किसी कारण से निशुल्क सुविधा का लाभ नही ले पाते है वे स्कूल की दीवारों,कॉलेज की दीवारों,बस स्टॉप,सुन-सान जगह य झाड़ियो में छिपकर अपनी इस संकट का समाधान निकालते है इसी बीच ऐसे भी तत्व होते है जो इनके शौच के समय व्यवधान उत्पन्न करते है ! कुछ मजाक बनाते है तो कुछ पीटना शुरू कर देते है ! कुछ वीडियो बनाते है तो कुछ गालियाँ देते है पर मूल समस्या जो है उसपे कोई प्रश्न चिन्ह नही उठाता !!

शहर में तो पुरुष की ये हालत है पर महिलाओ और बच्चियों के लिए तो वो भी साधन मौजूदनही है ! न सार्वजनिक शौचालय की स्थिति ऐसी है जिसका प्रयोग किया जा सके और न ही सार्वजनिक रूप से वो ऐसा कर सकती है !! क्योंकि बात नारी-समान और सिद्धांत की आती है तो ऐसे में उन्हें सब कुछ सोचकर घर से बाहर निकलना पड़ता है ! शहर में तो अब जागरूकता पैर पसार भी रही है पर गाँव की स्थिति दयनीय बनी हुयी है ! बच्चियों,महिलाओ को सुबह सवेरे उठकर सुन-सान य ऐसी जगह जाकर शौच करना होता है जहाँ किसी का        आना-जाना न हो ! अपने सम्मान और घर के सम्मन के खातिर चाहे कैसा भी मौसम हो उसे परिस्थिति को समझते हुए ऐसा करना ही पड़ता है ! कभी कभी शौच करते समय उन्हें कुछ अनजान लोग देखते भी है जिसके चलते कई बार घोर विवाद और लड़ाई झगड़े तक हो जाते है और कई अपराधिक मामले जैसे दुष्कर्म,शोषण,छेड़छाड़ के मामले भी अधिकांश इसी समय होते है जिसका अधिकारिक रिकॉर्ड सरकारी दस्तावेज ही बताते है ! अब समस्या ये है कि इतनी गम्भीर समस्या,चर्चा पर नेताओ ने य मीडिया वालो ने जोर तो दिया पर जागरूकता के नाम पर मात्र कुछ पंक्तियाँ दिखा दी ! नारे-दोहे बनाने से अगर शौच समस्या का हल हो जाता तो ये लेख लिखने की जरूरत न होती ! अपनी जिम्मेदारी से भागने वाले स्वार्थी नेता सिर्फ अखबार में शौच समस्या का समाधान बता सकते है पर वर्तमान समय में शौच सम्बन्धी विषयों के समस्याओ पर कोई लज्जा मारे ही नही बोलता है क्योंकि ऐसा बोलकर उसे अपने मान-सम्मान और लोक-लज्जा की परवाह होने लगती है ! पुरुष तो कहीं भी शर्म-ह्या भूलकर शौच कर भी लेते है पर महिलाओ का क्या ? वे तो अपना दुःख भी जता नही सकती मानो शौच केवल पुरुषो को लगता है !! समाज में कई शौचालय ऐसे है जो पूरी तरह खंडर है य जिनका इस्तेमाल करना किसी खतरे से कमनही है ! शौचालय की सुविधा मात्र टीवी,समाचार पत्रों की सुर्खियाँ मात्र ही बनकर रह गयी है आज के समयभारत में शौचालय की भयावह स्थिति - एक शर्मसार हकीकत ! में ! ऐसे में आम जन का कर्तव्य है कि वे अपने क्षेत्रीय नेता,समाज-सेवी से पूछे य उनसे आग्रह करे कि अपने क्षेत्र में एक शौचालय निर्माण हो जिसका इस्तेमाल करने में उसे शर्म नही बल्कि गर्व महसूस हो और वो साफ़-सफाई से युक्त हो ! क्योंकि कई बार देखा गया है कि शौच के दबाव में व्यक्ति अपनी समझ भूलकर उस जगह शौच कर देता है जहाँ उसका मान-सम्मान सब मिटटी में मिल जाता है !

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हमारे सर्वे में एक शाम को एक आदमी एक दीवार पर मूत्र विसर्जन कर रहा था,वो आदमी उस जगह से अपरिचित था और समय लगभग रात आठ बज रहे होंगे ! घोर अँधेरा था और उस दीवार पर चेतवानी भी लिखी हुयी थी और कुछ देवी-देवताओ के पोस्टर भी टाइल वाले लगे हुए थे ! पर जल्दबाजी में उसने वही मूत्र-विसर्जन करना उचित समझा ! जब वह व्यक्ति रास्ते से सुबह लौट रहा था तो उसे अपनी गलती का बड़ा अफ़सोस हुआ और क्रोधित भी ! क्योंकि सुलभ शौचालय वही पास में था जो कल रात बंद था और कोई दीवार पर थूके-थाके य मूत्र विसर्जन न करे इसीलिए भारत में शौचालय की भयावह स्थिति - एक शर्मसार हकीकत !देवी-देवताओ की टाइल की तस्वीरे लगा रखी थी ! मतलब शौच से बचने के लिए अब भगवान की तस्वीरों का इतना अनुचित इस्तेमाल से वो निराश हो गया और अब उसने इस विषय पर जागरूकता लाने की कसम खा ली ! वो व्यक्ति वहां रुककर इसका जिक्र तो नही कर सकता था पर जन-जागृति लाकर ऐसे लोगो को रोक सकता था जो देवी-देवताओ की तस्वीरों का इस्तेमाल मूत्र विसर्जन य थूकने से रोकने के लिए करते है ! अब वह व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में अपने कार्यो के साथ शौचालय की महत्वता लोगो को बताता और उसके लाभ गिनवाता ! तो पाठको आप भी प्रयत्न करे कि आस-पास कोई मजबूरी के कारण शौच कर रहा हो तो उस मजबूरी को खत्म करने का कार्य करे न कि मजबूर व्यक्ति को ! मजबूरी हमारी है कि हम अपने जीवन में इतना उलझे हुए है कि सामाजिक समस्या पर मिलकर उसका समाधान नही ढूढ़ते और दोष एक दूसरे को देते है ! हमे अपनी सरकार और नेताओ से मांग करनी चाहिए कि अपने क्षेत्र में वे स्वच्छ शौचालय जिसका रख-रखाव बराबर हो उसकी स्थापना की जाये ताकि आम-जन को कोई समस्या न आये ! य सम्पन्न समूह खुद इसकी जिम्मेदारी उठाये जिससे लोक-कल्याण में उनका नाम भी दर्ज हो सके !